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21 October 2026

1 मेगावाट सोलर प्लांट की कीमत 2026: पूरा खर्च और मुनाफा

भारत में 1 मेगावाट ग्राउंड माउंटेड सोलर प्लांट, 1 मेगावाट सोलर प्लांट की कीमत 2026

1 मेगावाट सोलर प्लांट की कीमत 2026 में ₹3.5 करोड़ से ₹5 करोड़ के बीच है, यानी ₹35 से ₹50 प्रति वाट, जमीन की कीमत अलग। यह रेंज चौड़ी क्यों है, इसका जवाब चार फैसलों में छिपा है: मॉड्यूल कौन सा लगेगा, डीसीआर या नॉन-डीसीआर, प्लांट ज़मीन पर लगेगा या छत पर, और ग्रिड का सबस्टेशन कितनी दूर है।

नीचे पूरा खर्च लाइन दर लाइन दिया गया है, साथ में यह भी कि 2026 में जीएसटी, एएलएमएम लिस्ट-II और डीसीआर मॉड्यूल की कीमतों में क्या बदला, 1 मेगावाट प्लांट रोज़ कितनी यूनिट बनाता है, कितनी ज़मीन चाहिए और पैसा कितने साल में वापस आता है। हम मॉड्यूल बनाने वाली कंपनी हैं। क्रेडेंस सोलर राजकोट के 2.2 गीगावाट प्लांट में मोनो पर्क और टॉपकॉन मॉड्यूल बनाती है, इसलिए नीचे दिए मॉड्यूल रेट वही हैं जो बाज़ार में हर हफ्ते चल रहे हैं। अंग्रेज़ी में पूरी गाइड के लिए cost of 1 MW solar plant देखें।

1 मेगावाट सोलर प्लांट की कीमत: सीधा जवाब

प्लांट का प्रकार प्रति वाट खर्च 1 मेगावाट की कुल कीमत
ज़मीन पर, नॉन-डीसीआर मॉड्यूल ₹35 से ₹40 ₹3.5 से ₹4.0 करोड़
छत पर / सी एंड आई, नॉन-डीसीआर मॉड्यूल ₹38 से ₹42 ₹3.8 से ₹4.2 करोड़
ज़मीन पर, डीसीआर मॉड्यूल ₹43 से ₹50 ₹4.3 से ₹5.0 करोड़

छत वाले प्लांट प्रति वाट महंगे पड़ते हैं, क्योंकि स्ट्रक्चर छत के हिसाब से बनाना पड़ता है, केबल की लंबाई बढ़ती है और सुरक्षा का काम मज़दूरी बढ़ा देता है। ज़मीन वाले प्लांट में स्ट्रक्चर सस्ता पड़ता है, लेकिन 4 से 5 एकड़ ज़मीन और सबस्टेशन तक लाइन का खर्च जुड़ जाता है। इस साल सबसे बड़ा अंतर डीसीआर प्रीमियम से आ रहा है।

खर्च का पूरा ब्यौरा

नीचे की तालिका ज़मीन पर लगने वाले 1 मेगावाट प्लांट की है, जिसमें नॉन-डीसीआर टॉपकॉन मॉड्यूल लगे हैं। आपके ईपीसी कोटेशन में साइट, वोल्टेज लेवल और ब्रांड के हिसाब से फर्क आएगा।

हिस्सा अनुमानित खर्च कुल का हिस्सा
सोलर मॉड्यूल (1 मेगावाट) ₹1.45 से ₹1.9 करोड़ 40 से 50%
इन्वर्टर ₹30 से ₹50 लाख 9 से 12%
स्ट्रक्चर, केबल, अर्थिंग, स्विचगियर, सिविल ₹85 लाख से ₹1 करोड़ 22 से 26%
ट्रांसफॉर्मर और ग्रिड कनेक्शन दूरी और वोल्टेज पर निर्भर अलग से जोड़ें
ईपीसी मार्जिन, डिज़ाइन, मंज़ूरी, कमीशनिंग ₹45 से ₹50 लाख 12 से 13%
कुल (ज़मीन को छोड़कर) ₹3.5 से ₹4.0 करोड़ 100%

सोलर मॉड्यूल

मॉड्यूल सबसे बड़ी लाइन है। जेएमके रिसर्च की मॉड्यूल प्राइस ट्रैकिंग के अनुसार 2026 में नॉन-डीसीआर मोनो पर्क करीब ₹13.8 प्रति वाट, नॉन-डीसीआर टॉपकॉन ₹14.2 प्रति वाट और डीसीआर टॉपकॉन ₹22.3 प्रति वाट पर बिका। ₹14 से ₹15 प्रति वाट और 5 प्रतिशत जीएसटी जोड़कर 1 मेगावाट के मॉड्यूल ₹1.5 से ₹1.6 करोड़ में आते हैं। बाइफेशियल ग्लास-टू-ग्लास और ज़्यादा वाट वाले फॉर्मेट इससे ऊपर जाते हैं। तकनीक का चुनाव बाकी है तो टॉपकॉन बाइफेशियल पैनल की गाइड देखें।

इन्वर्टर

ज़्यादातर 1 मेगावाट प्लांट में 100 से 125 किलोवाट के आठ से दस स्ट्रिंग इन्वर्टर लगते हैं, या एक सेंट्रल इन्वर्टर। स्ट्रिंग इन्वर्टर थोड़े महंगे हैं, लेकिन खराबी ढूंढना आसान रहता है और एक यूनिट बंद होने पर पूरा प्लांट नहीं रुकता। इसके लिए ₹30 से ₹50 लाख रखें।

स्ट्रक्चर, केबल, सिविल और स्विचगियर

इसमें गैल्वनाइज़्ड माउंटिंग स्ट्रक्चर, फाउंडेशन, डीसी-एसी केबल, कॉम्बाइनर बॉक्स, अर्थिंग, लाइटनिंग प्रोटेक्शन, फेंसिंग और कंट्रोल रूम आता है। समुद्र के किनारे और ज़्यादा नमी वाले इलाकों में हॉट-डिप गैल्वनाइज़्ड स्ट्रक्चर की कोटिंग मोटाई पर समझौता न करें, वरना चार-पांच साल में जंग दिखने लगती है।

ट्रांसफॉर्मर और ग्रिड कनेक्शन

1 मेगावाट प्लांट आम तौर पर 11 केवी या 22 केवी पर जुड़ता है, इसलिए स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर, मीटरिंग क्यूबिकल और सबस्टेशन तक लाइन चाहिए। सबस्टेशन पास है तो यह खर्च नाममात्र रहता है। तीन किलोमीटर दूर है तो यह दसियों लाख जोड़ देता है। हर ईपीसी कोटेशन में यह लाइन अलग से मांगें।

ज़मीन (अलग से)

ज़मीन पर लगने वाले 1 मेगावाट प्लांट के लिए सामान्य मॉड्यूल के साथ 4 से 5 एकड़ चाहिए। छत वाले प्लांट के लिए करीब 80,000 वर्ग फुट छाया-मुक्त छत चाहिए। ज़मीन के भाव इलाके के हिसाब से इतने बदलते हैं कि एक आंकड़ा देना सही नहीं होगा, इसलिए ज़्यादातर निवेशक अपनी ही ज़मीन इस्तेमाल करते हैं या लंबी लीज़ पर लेते हैं।

1 मेगावाट सोलर प्लांट कितनी यूनिट बनाता है

एक मेगावाट प्लांट रोज़ करीब 4,100 से 4,600 यूनिट बनाता है, यानी साल में 15 से 17 लाख यूनिट। गुजरात और राजस्थान में यह आंकड़ा ऊपरी सिरे पर रहता है, और पूर्वी तथा पहाड़ी राज्यों में नीचे। हर साल जनरेशन में 0.4 से 0.55 प्रतिशत की गिरावट मानकर चलें, जो मॉड्यूल की लीनियर वारंटी में लिखी होती है।

₹4 प्रति यूनिट के पीपीए रेट पर यह साल में ₹60 से ₹68 लाख की आय है। कैप्टिव इस्तेमाल में, जहां आप ₹8 से ₹9 प्रति यूनिट का औद्योगिक टैरिफ बचाते हैं, वही प्लांट साल में ₹1.2 करोड़ तक की बचत देता है। इसी वजह से फैक्ट्री की छत पर लगने वाले प्लांट का पेबैक सबसे तेज़ होता है। एक्सपोर्ट पर कमाई का हिसाब नेट मीटरिंग के नियमों से तय होता है, जो हर राज्य में अलग हैं।

2026 में क्या बदला: जीएसटी, एएलएमएम लिस्ट-II और डीसीआर

तीन नीतिगत बदलाव इस साल की कीमत तय कर रहे हैं।

जीएसटी 5 प्रतिशत हुआ। 22 सितंबर 2025 से सोलर सेल, मॉड्यूल और सोलर पावर जनरेटिंग सिस्टम पर जीएसटी 12 से घटकर 5 प्रतिशत हो गया। इससे प्रोजेक्ट कैपेक्स में करीब 5 प्रतिशत की कमी आई है। ईपीसी कॉन्ट्रैक्ट के सर्विस हिस्से पर अब भी 18 प्रतिशत लग सकता है, इसलिए इनवॉइस में सामान और सेवा का बंटवारा ज़रूर देखें।

सेल के लिए एएलएमएम लिस्ट-II। 1 जून 2026 से एमएनआरई की एएलएमएम सूची वाले प्रोजेक्टों में मॉड्यूल उन्हीं सेल से बनने चाहिए जो लिस्ट-II में अप्रूव्ड हैं। इससे भारत में बने सेल की मांग बढ़ी है और भाव भी।

डीसीआर मॉड्यूल का प्रीमियम। डीसीआर मॉड्यूल में सेल और मॉड्यूल दोनों भारत में बने होने चाहिए। सरकारी योजनाओं और पीएम कुसुम जैसी स्कीमों में यही शर्त है, और इसी वजह से डीसीआर मॉड्यूल नॉन-डीसीआर से करीब 55 प्रतिशत महंगे बिक रहे हैं। आपका प्रोजेक्ट किस श्रेणी में आता है, यह तय करने से पहले बजट न बनाएं।

पेबैक और रिटर्न

₹3.8 करोड़ के ज़मीन वाले प्लांट पर, जो साल में 16 लाख यूनिट बनाता है और ₹4 प्रति यूनिट पर बेचता है, सालाना आय ₹64 लाख होती है। ऑपरेशन और मेंटेनेंस का खर्च ₹4 से ₹6 लाख निकालने के बाद शुद्ध आय ₹58 से ₹60 लाख रहती है, और पैसा 6 से 7 साल में वापस आ जाता है। प्लांट की उम्र 25 साल है, इसलिए बाकी 18 साल की आय शुद्ध मुनाफा है।

कैप्टिव प्लांट में, जहां आप ₹8 प्रति यूनिट का टैरिफ बचा रहे हैं, पेबैक 4 से 5 साल में हो जाता है। यहीं सबसे ज़्यादा फर्क मॉड्यूल की क्वालिटी से पड़ता है, क्योंकि 25 साल में आधा प्रतिशत सालाना गिरावट और 0.7 प्रतिशत गिरावट के बीच का अंतर लाखों यूनिट का होता है।

ईपीसी कोटेशन में क्या जांचें

  • मॉड्यूल का मॉडल नंबर, वाट रेटिंग और एएलएमएम स्टेटस, सिर्फ ब्रांड नहीं
  • इन्वर्टर की संख्या, क्षमता और वारंटी की अवधि
  • स्ट्रक्चर की गैल्वनाइज़िंग मोटाई (माइक्रोन में)
  • ट्रांसफॉर्मर और सबस्टेशन तक लाइन का खर्च, अलग लाइन में
  • जनरेशन गारंटी और परफॉर्मेंस रेशियो, आमतौर पर 78 से 82 प्रतिशत
  • ओ एंड एम कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें और सफाई की फ्रीक्वेंसी

ठेकेदार चुनते समय भारत की सोलर ईपीसी कंपनियों की सूची मददगार रहती है, और मॉड्यूल सप्लायर की तुलना के लिए भारत के प्रमुख सोलर पैनल निर्माताओं की गाइड देखें।

निष्कर्ष

2026 में 1 मेगावाट सोलर प्लांट ₹3.5 से ₹5 करोड़ में लगता है। नॉन-डीसीआर मॉड्यूल के साथ ज़मीन पर लगने वाला प्लांट सबसे सस्ता पड़ता है, और डीसीआर की शर्त वाला प्रोजेक्ट सबसे महंगा। प्लांट रोज़ 4,100 से 4,600 यूनिट बनाता है, पीपीए मॉडल में 6 से 7 साल और कैप्टिव मॉडल में 4 से 5 साल में पैसा वापस कर देता है।

अगर आप मेगावाट स्तर के प्रोजेक्ट के लिए मॉड्यूल की थोक कीमत चाहते हैं, तो हमारी डेटाशीट डाउनलोड करें या हमसे संपर्क करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1 मेगावाट सोलर प्लांट लगाने में कितना खर्च आता है?

2026 में ज़मीन पर लगने वाले 1 मेगावाट प्लांट पर ₹3.5 से ₹4 करोड़ का खर्च आता है, जमीन अलग। डीसीआर मॉड्यूल की शर्त हो तो यह ₹4.3 से ₹5 करोड़ तक जाता है। छत पर लगने वाले सी एंड आई प्लांट ₹3.8 से ₹4.2 करोड़ में बनते हैं।

1 मेगावाट सोलर प्लांट कितनी यूनिट बनाता है?

एक मेगावाट प्लांट रोज़ 4,100 से 4,600 यूनिट और साल में 15 से 17 लाख यूनिट बनाता है। यह आंकड़ा जगह की धूप, मॉड्यूल की तकनीक और प्लांट के परफॉर्मेंस रेशियो पर निर्भर करता है। गुजरात और राजस्थान में जनरेशन ऊपरी सिरे पर रहता है।

1 मेगावाट सोलर प्लांट के लिए कितनी ज़मीन चाहिए?

ज़मीन पर लगने वाले प्लांट के लिए 4 से 5 एकड़ चाहिए। ज़्यादा वाट वाले मॉड्यूल लगाने पर यह ज़रूरत थोड़ी घटती है, क्योंकि उतनी ही क्षमता कम पैनल में आ जाती है। छत पर लगाने के लिए करीब 80,000 वर्ग फुट छाया-मुक्त जगह चाहिए।

क्या 1 मेगावाट सोलर प्लांट पर सब्सिडी मिलती है?

पीएम सूर्य घर योजना सिर्फ घरेलू रूफटॉप के लिए है, मेगावाट स्तर के प्लांट उसमें नहीं आते। व्यावसायिक प्लांट के लिए एक्सेलरेटेड डेप्रिसिएशन, पीएम कुसुम जैसी योजनाएं और राज्य की ओपन एक्सेस नीतियां काम आती हैं। बैंक और एनबीएफसी इन प्रोजेक्टों को 70 से 75 प्रतिशत तक फाइनेंस करते हैं।

डीसीआर और नॉन-डीसीआर मॉड्यूल में क्या अंतर है?

डीसीआर यानी डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट। डीसीआर मॉड्यूल में सेल और मॉड्यूल दोनों भारत में बने होने चाहिए, जबकि नॉन-डीसीआर में सेल आयातित हो सकता है। सरकारी योजनाओं में डीसीआर अनिवार्य है और यह करीब 55 प्रतिशत महंगा पड़ता है।

1 मेगावाट प्लांट का पैसा कितने साल में वापस आता है?

पीपीए पर बिजली बेचने वाले प्लांट में 6 से 7 साल और फैक्ट्री के कैप्टिव इस्तेमाल वाले प्लांट में 4 से 5 साल लगते हैं। कैप्टिव प्लांट में पेबैक तेज़ होता है, क्योंकि वहां आप ₹8 से ₹9 प्रति यूनिट का औद्योगिक टैरिफ बचाते हैं, जबकि पीपीए रेट ₹4 के आसपास रहता है।